भाग 18 · आपात उपबंध

अनुच्छेद 353 आपात की उदृघोषणा का प्रभाव— जब आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में है

  1. तब—
  2. (क) संविधान में किसी बात के होते हए भी, संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी राज्य को इस बारे में निंदेश श दे ने तक होगा कि वह राज्य अपनी कार्यपालिका शक्ति का किस रीति से प्रयोग करे; देने (ख) किसी विषय के संबंध में विधियां बनाने की संसद् की शक्ति के अंतर्गत इस बात के होते हुए भी कि वह संघ सूची में प्रगणित विषय नहीं है, ऐसी विधियां बनाने की शक्ति होगी जो उस विषय के संबंध में संघ को या संघ के और प्राधिकारियों को शक्तियां प्रदान करती हैं और उन पर कर्तव्य अधिरोपित करती हैं या का प्रदान किया जाना और का अधिरोपित किया जाना प्राधिकृत करती है: अधिकारियों शक्तियों कर्तव्यों अन्तःस्तापित और तत्पश्चात ् खंड (4) और खंड (5), खंड (9) के रूप में पुनःसंख्यांकित और संविधान (चवाल्लीसवां संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 37 द्वारा (20-6-1979 से) खंड (5) का लोप किया गया । संविधान (चवालीसवां स्थान पर प्रतिस्थापित । । परन्त परन्तु जहां आपात की उद्घोषणा भारत के राज्यक्षेत्र के केवल किसी भाग में प्रवर्तन मैं है वहां यदि और जहां तक भारत या उसके राज्यक्षेत्र के किसी भाग की सुरक्षा, जिसमें भारत के राज्यक्षेत्र के उस भाग में या उसके संबंध में, आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में है, होने वाले क्रियाकलाप के कारण संकट में है तो और वहां तक,– (i) खंड (क) के अधीन निदेश देने श की ने संघ की कार्यपालिका शक्ति का; और (ा) खंड (ख) के अधीन विधि बनाने की संसद् की शक्ति का, विस्तार किसी ऐसे राज्य पर भी होगा जो उस राज्य से भिन्न है या जिसके किसी भाग में आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में है । जिसमें

इसका अर्थ

ऊपर लिखे अनुच्छेद का सार। यह कानूनी सलाह नहीं है।

यह अनुच्छेद आपातकाल का प्रभाव बताता है। संघ की कार्यपालिका शक्ति राज्यों को किसी भी मामले में निर्देश देने तक फैल जाती है। संसद को राज्य विषयों पर कानून बनाने की शक्ति मिलती है। लोक सभा और राज्य सभाओं की अवधि एक-एक वर्ष बढ़ सकती है। आपातकाल चलते संघीय ढांचा संघ की ओर झुक जाता है।

Article 353 in English