भाग 3 · मूल अधिकार
अनुच्छेद 16 लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता–(1) राज्य के अधीन किसी पद पर
- नियोजन या नियुक्ति क्त से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी ।
- (2) राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा ।
- (3) इस की द कोई बात संसद् को कोई ऐसी विधि बनाने से निवारित नहीं करेगी गी जो किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र की सरकार के या उसमें के किसी स्थानीय या अन्य अनुच्छेद प्राधिकारी के अधीन वाले किसी वर्ग या के पद पर नियोजन या के संबंध में ऐसे नियोजन या से पहले उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के भीतर निवास विषयक कोई वर्गों नियुक्ति विहित करती है । नियुक्ति (4) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को हुए नागरिकों के किसी वर्ग के मैं, अपेक्षा जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पयार्प्त नहीं है, या पदों के के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करे गी । पिछड़े पक्ष 2 पर्याप्त नियुक्तियों (4क) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित आरक्षण जनजातियों के में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पयार्प्त नहीं है, राज्य के अधीन सेवाओं मैं वर्ग या के पदों पर, पारिणामिक शू(4क) ज्येष्ठता सहित, प्रोन्नति के मामलों में के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं पक्ष करे " (वख) । पर्याप्त थृकिसी वर्गों (4ख) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को किसी वर्ष में किन्हीं न भरी गई ऐसी आरक्षण 4 को, जो खंड (4) या खंड (4क) के अधीन किए गए के लिए किसी उपबंध के अनस उस वर्ष में भरी जाने के लिए हैं, किसी वर्ष या में भरे जाने के रिक्तियों आरक्षण लिए प वगर् के रूप में विचार करने से निवारित नहीं करेगी गी और ऐसे वर्ग की अनुसार आरक्षित उत्तरवर्ती वर्षों रिक्तियों पर उस वर्ष की रिक्तियों के साथ वे भरी जा रही हैं, उस वर्ष की रिक्तियों पृथक् वर्ग की रिक्तियों की कुल संख्या के संबंध में पचास प्रतिशत की अधिकतम सीमा का अवधारण करने जिसमें के लिए विचार नहीं किया जाएगा । आरक्षण संविधान 1. (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 29 और अनुसूची द्वारा (1-11-1956 से) “पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी राज्य के या उसके क्षेत्र में किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन उस राज्य के भीतर निवास विषयक कोई अपेक्षा विहित करती हो” के स्थान पर प्रतिस्थापित । । संविधान (सतहत्तरवां 3. (पचासीवां संशोधन) अधिनियम, 2001 की धारा 2 द्वारा प्रवाभ से) (17-6-1995 से) कुछ शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित । । संविधान (भूतलक्षी 4. (इक्यासीवां संशोधन) अधिनियम, 2000 की धारा 2 दूवारा (9-6-2000 से) अंतःस्थापित । । संविधान (5) इस अनुच्छेद की कोई बात किसी ऐसी विधि के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी जो धार्मिक यह उपबंध करती है कि किसी या सांप्रदायिक संस्था के कार्यकलाप से संबंधित कोई पदघारी या उसके शासी निकाय का कोई सदस्य किसी विशिष्ट धर्म का मानने वाला या विशिष्ट संप्रदाय का ही हो । (6) इस अनुच्छेद की कोई बात, राज्य को विद्यमान आरक्षण के अतिरिक्त तथा प्रत्येक प्रवर्ग में पदों के अधिकतम दस प्रतिशत के अध्यधीन, खंड (4) में उल्लिखित वर्गों से भिन्न नागरिकों के आर्थिक रूप से दुर्बल दब किन्हीं वर्गों पक्ष नियुक्तियों र्ल के में और पदों के आरक्षण के लिए कोई भी उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी गी । अस्पृश्यता अंत-“अस्पृश्यता”
इसका अर्थ
ऊपर लिखे अनुच्छेद का सार। यह कानूनी सलाह नहीं है।
यह अनुच्छेद सरकारी नौकरियों में सब नागरिकों को बराबर मौका दिलाता है। धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म या निवास के आधार पर किसी नागरिक को केवल इसलिए बाहर नहीं रखा जा सकता। संसद या राज्य विधान-मंडल कुछ पदों के लिए निवास की शर्त रख सकते हैं। पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण भी हो सकता है।