भाग 3 · मूल अधिकार
अनुच्छेद 21 प्राण और दै स्वतंत्रता का व्यक्ति को उसके प्राण या दै
- किसी साक्षी स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं । ।
इसका अर्थ
ऊपर लिखे अनुच्छेद का सार। यह कानूनी सलाह नहीं है।
यह अनुच्छेद कहता है कि उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना किसी से प्राण या दैहिक स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती। अदालतों ने इसे व्यापक अर्थ दिया है। प्राण का अधिकार गरिमा के साथ जीने का अधिकार है, जिसमें स्वच्छ पर्यावरण, स्वास्थ्य, आवास और निजता जैसी बातें आती हैं। भारतीय अदालतों में यह सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला मूल अधिकार है।