भाग 3 · मूल अधिकार
अनुच्छेद 19 वाक् कुछ अधिकारों का सभी नागरिकों को– वाक्-स्वातंत््य अभिव्यक्ति-स्वातंत्रय
- शांतिपूर्वक (क) वाक् और का
- (ख) र्क और निरायुध सम्मेलन का; संविधान (ग) संगम या संघ थृया सहकारी सोसाइटी बनाने का; संविधान (घ) भारत के राज्यक्षेत्र मैं सर्वत्र अबाध संचरण का; थू(च)* (ड) भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास करने और बस जाने का; और वृत्ति, उपजीविका, के के न थी *
- (छ) कोई व व्यापार या कारबार करने का, अधिकार होगा । सुरक्षा, विदेशी राज्यों (2) खंड (1) के उपखंड (क) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के 3 निर्बंधन निर्बधन प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की शी के साथ मैत्रीपूर्ण वाल्ली संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे अधिरोपित करने कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी गी ।
- (3) उक्त खंड के उपखंड (ख) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के वात्ली प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडता या लोक व्यवस्था के हितों में युक्तियुक्त निर्बन्धन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करे गी ।
- (4) उक्त खंड के उपखंड (ग) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुत्ता और अखंडता या लोक व्यवस्था या सदाचार के हितों में युक्तियुक्त निर्बन्धन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करे गी ।
- (5) उक्त खंड के उपखंड (घ) और उपखंड (ड) की कोई बात उक्त उपखंडों दूवारा दिए गए अधिकारों के प्रयोग पर साधारण जनता के हितों में या किसी अनुसूचित जनजाति के संरक्षण युक्तियुक्त निर्बन्धन हितों के के लिए क्तयक् त जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करे भ. । संविधान (चवालबीसवां गया । संविधान 3. (पहला संशोधन) अधिनियम, 1951 की धारा 3 द्वारा (भूतलक्षी प्रभाव से) खंड (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित । संविधान 5. संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 2 द्वारा (20-6-1979 से) “उपखंड (घ), उपखंड (ड) और उपखंड (च)” के स्थान पर प्रतिस्थापित । जि संविधान (चवालीसवां (जे (छा. दि भारत का संविधान 11 (6) उक्त खंड के उपखंड (छ) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के युक्तियुक्त निर्बन्धन प्रयोग पर साधारण जनता के हितों में त जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी गी और विशिष्टतया उक्त उपखंड की कोई बात— (i) कोई वृत्ति, व उपजीविका, व्यापार या कारबार करने के लिए आवश्यक वृत्तिक व या तकनीकी अहँताओं से; या (ii) राज्य दूवारा या राज्य के स्वामित्व या नियंत्रण मैं किसी निगम दूवारा कोई व्यापार, कारबार, उद्योग या सेवा, नागरिकों का पूर्णतः या भागतः अपवर्जन करके या अन्यथा, चलाए जाने से, जहां तक कोई विद्यमान विधि संबंध रखती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या इस प्रकार संबंध रखने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी गी ।
इसका अर्थ
ऊपर लिखे अनुच्छेद का सार। यह कानूनी सलाह नहीं है।
यह अनुच्छेद नागरिकों को छह स्वतंत्रताएं देता है: भाषण और अभिव्यक्ति; निःशस्त्र सभा; संगठन बनाना; आवागमन; निवास; और कोई भी पेशा या व्यापार। हर स्वतंत्रता पर उचित सीमाएं लग सकती हैं। सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या दूसरों के अधिकारों जैसे कारण बताकर राज्य सीमा रख सकता है। ये स्वतंत्रताएं केवल नागरिकों को मिलती हैं।