भाग 3 · मूल अधिकार
अनुच्छेद 35 इस भाग के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए विधान
- इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी,—
- (क) संसद् को शक्ति होगी और किसी राज्य के विधान-मंडल को शक्ति नहीं होगी कि वह— (i) के लिए अनच् छे द 16 के खंड (3), अनच् छे द 32 के जिन विषयों अनुच्छेद अनुच्छेद खंड (3), अनुच्छेद द 33 और अनुच्छेद द 34 के अधीन संसद् विधि द्वारा उपबंध कर सकेगी उनमें से किसी के लिए; और (ii) ऐसे के लिए, जो इस भाग के अधीन अपराध घोषित किए गए हैं, दंड ड करने के लिए, कार्यों विधि बनाए और संसद् इस संविधान के प्रारंभ भ के पश्चात ् यथाशक्य शीघ्र ऐसे के विहित लिए, जो उपखंड (ii) मैं हैं, दंड ड करने के लिए विधि बनाएगी
- (ख) खंड (क) के उपखंड (i) में विषयों मैं से किसी से संबंधित या उस कार्यों खंड के उपखंड (ii) मैं ष्ट कायर् के लिए दंड ड का उपबंध करने कोई प्रव जो भारत के राज्यक्षेत्र में इस संविधान के प्रारंभ भ से ठीक पहले प्रव थी, निर्दिष्ट विहित उसके निबंधनों के और अनच् छे द 372 के अधीन उसमें किए गए अनक और उपांतरणों के अधीन रहते हुए तब तक प्रव रहे गी जब तक उसका संसद् द्वारा निर्दिष्ट या निरसन या संशोधन नहीं कर दिया जाता है । निर्दिष्ट किसी कार्य वाल्ली स्पष्टीकरण-इस अनुच्छेद में, “प्रव पद का वही अर्थ है जो अनुच्छेद द 372 में प्रवृत्त विधि, प्रवृत्त है । अनुच्छेद किन््हीं अनुकूलनों प्रवृत्त रहेगी परिवर्तन “प्रवृत्त विधि” भाग 4 राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व शक
इसका अर्थ
ऊपर लिखे अनुच्छेद का सार। यह कानूनी सलाह नहीं है।
यह अनुच्छेद इस भाग के अधिकारों को लागू कराने के कानून बनाने की शक्ति केवल संसद को देता है। इसमें संविधान जिन कृत्यों को अपराध बताता है, उनके लिए दंड तय करना भी आता है। राज्य विधान-मंडल ऐसे कानून नहीं बना सकते। इससे अधिकारों के उल्लंघन की सजा पूरे देश में एक जैसी रहती है।