भाग 12 · वित्त, संपत्ति, संविदाएं और वाद
अनुच्छेद 296 राजगामी या व्यपगत या वामी वह न होने से
- संपि त— इसम स्वामीविहीन प्रोद्धत संपत्ति इसमें इसके प चात ् यथा उपबं धत के अधीन रहते हुए; ए, भारत के रा मैं म कोई संपि त, जो पश्चात् उपबंधित राज्यक्षेत्र संपत्ति, यदि द यह सं वधान वतन म नह ं आया होता तो राजगामी या व्यपगत होने से या संविधान प्रवर्तन में नहीं अ धकारवान ् वामी के अभाव में वामी वह न होने से, थ त, हज मजे ट को या अधिकारवान् स्वामी स्वामीविहीन यथास्थिति, हिज मजेस्टी किसी देशी शी रा य के शासक को त हु ई होती, यदि द वह संपि त कसी में य म थत राज्य प्रोद्धत हुई संपत्ति किसी राज्य स्थित है तो ऐसे रा में म और किसी अ य दशा में संघ में न हत होगी: राज्य अन्य निहित 2--वित्त, संपत्ति, संपत्ति, परंतु तु कोई जो उस तारीख को जब वह इस प्रकार हिज मजेस्टी को या देशी शी राज्य के शासक को प्रोदूभूत हुई होती, भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के कब्जे या नियंत्रण मैं थी तब, यदि वे प्रयोजन, जिनके लिए वह उस समय प्रयुक्त या धारित थीं, संघ के थे तो वह संघ में या किसी राज्य के थे तो वह उस राज्य में निहित होगी ।
- व्याख्या।स्पष्टीकरण इस अनुच्छेद में, “शासक” और “देशी शी राज्य” पदों के वही अर्थ हैं जो अनुच्छेद द 363 में हैं । राज्यक्षेत्रीय
इसका अर्थ
ऊपर लिखे अनुच्छेद का सार। यह कानूनी सलाह नहीं है।
यह अनुच्छेद मालिक के बिना संपत्ति से जुड़ा है। जो संपत्ति पहले ब्रिटिश ताज को बिना वारिस मरने या समाप्ति से मिलती, वह अब राज्य को जाती है, या संघ को जब कोई राज्य न लागू हो। राज्य के भीतर बिना मालिक की संपत्ति भी वैसे ही। मालिकहीन संपत्ति को सार्वजनिक घर मिलता है।