भाग 6 · राज्य

अनुच्छेद 224 अपर और न्यायाधीशों की (1) उच्च

  1. न्यायालय के कार्य में किसी अस्थायी व के कारण या उसमें कार्य की बकाया के कर्तव्यों कार्यकारी नियुक्ति-- यदि किसी वृद्धि भ. संविधान (निन्‍्यानवेवां संशोधन) अधिनियम, 2014 की धारा 7 दूवारा (13-4-2015 से) “भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करने के पश्चात ्” के स्थान पर प्रतिस्थापित । यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स आन एसोसिएशन और अन्य बनाम भारत संघ ए.आई.आर. 2016 एस.सी. 117 में उच्चतम न्यायालय के तारीख 16-10-2015 के आदेश श द्वारा कर दिया गया है । रिकार्ड शब्दों का लोप किया गया । दूवारा अभिखंडित संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 14 द्वारा (1-11-1956 से) मूल खंड (2) का लोप किया गया । संविधान प्रतिस्थापित । संविधान संविधान कारण राष्ट्रपति को यह प्रतीत होता है कि उस न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या को तत्समय बढ़ा देना चाहिए ना तो राष्ट्रपति, राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के परामर्श से, सम्यक रूप से अर्हित व्यक्तियों को दो वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए जो वह विनिर्दिष्ट करे, उस न्यायालय के अपर न्यायाधीश नियुक्त कर सकेगा ।
  2. (2) जब किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न कोई न्यायाधीश अनुपस्थिति के कारण या अन्य कारण से अपने पद के का पालन करने में कर्तव्यों असमर्थ है या मुख्य न्यायमूर्ति के रूप में अस्थायी रूप से कार्य करने के लिए नियुक्त किया जाता है तो राष्ट्रपति, राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के परामर्श से, सम्यक् नियुक्ति रूप से किसी व्यक्ति को तब तक के लिए उस न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में अर्हित कार्य करने के लिए नियुक्त कर सकेगा जब तक स्थायी न्यायाधीश अपने को कर्तव्यों फिर से नहीं संभाल लेता है ।
  3. (3) उच्च न्यायालय के अपर या न्यायाधीश के रूप में नियक्त कोई व्यक्ति थृबासठ वर्ष की आय प्राप्त कर लेने के पश्चात ् पद धारण नहीं करे गा । कार्यकारी 3

इसका अर्थ

ऊपर लिखे अनुच्छेद का सार। यह कानूनी सलाह नहीं है।

यह अनुच्छेद अतिरिक्त और कार्यवाहीकारी न्यायाधीशों की नियुक्ति देता है। उच्च न्यायालय का काम अस्थायी रूप से बढ़ जाए, तो राष्ट्रपति दो वर्ष तक के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त कर सकते हैं। कार्यवाहीकारी न्यायाधीश किसी स्थायी न्यायाधीश की अनुपस्थिति भरते हैं। अस्थायी न्यायाधीश अदालत को चलाए रखते हैं।

Article 224 in English