भाग 6 · राज्य
अनुच्छेद 226 कुछ रिट निकालने की उ च यायालय क शि त— (1) अनु छे द 32 प्रत्येक उच्च न्यायालय राज्यक्षेत्रों सर्वत्र,
- में किसी बात के होते हुए ए भी 3*** येक उ च यायालय को उन रा मैं जिनके म सव, अधिकारिता प्रयोग प्रदत्त संबंध में वह अपनी अ धका रता का योग करता है, भाग 3 द्वारा द अधिकारों त प्रवर्तित अन्य प्रयोजन में धकार म से किसी को व तत कराने के लिए और किसी अ य योजन के लिए उन राज्यक्षेत्रों व्यक्ति प्राधिकारी समुचित मामलों में किसी रा य के भीतर किसी यि त या धकार को या समु चत मामल म कसी सरकार आदेश प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, को ऐसे निदेश, श, आदे श या रिट जिनके अंतर्गत “बंदी य परमादे अधिकार-पृच्छा श, तषे ध, उत्प्रेषण रिट शक्ति अ धकार-पृ छा और उ हैं, ह, या उनमें से कोई निकालने की शि त होगी । किसी (2) कसी सरकार, प्राधिकारी धकार या व्यक्ति यि त को निदेश, आदेश श, आदे श या रिट निकालने की खंड दूवारा ड प्रदत्त (1) शक्ति वारा द त शि त का प्रयोग योग उन राज्यक्षेत्रों रा य के संबंध मैं, जिनके भीतर ऐसी शक्ति शि त के प्रयोग योग के लिए वादहेतुक वादहे पूर्णतः: तु क पू णत: या भागत: उत्पन्न उ प न होता है, अधिकारिता अ धका रता का प्रयोग योग करने वाले किसी उच्च उ न्यायालय च दूवारा यायालय वारा भी, इस बात के होते हुए ए भी किया जा संविधान (बयालीसवां अधिनियम, न.. सं वधान (बयाल सवां संशोधन) अ ध नयम, 1976 की धारा 37 द्वारा (1-2-1977 से) लोप किया गया और तत्पश्चात् संविधान (चवालीसवां अधिनियम, अंतःस्थापित । त प चात ् सं वधान (चवाल सवां संशोधन) अ ध नयम, 1978 की धारा 29 दूवारा (20-6-1979 से) अंतः था पत । संविधान (बयालीसवां अधिनियम, अनुच्छेद प्रतिस्थापित । त था पत । संविधान 3. (तैंतालीसवां सं वधान (तताल सवां संशोधन) अधिनियम, अ ध नयम, 1977 की धारा 7 द्वारा (13-4-1978 से) “किंतु “ अनुच्छेद कं तु अनु छे द 131क और अनुच्छेद अनु छे द 226क के उपबंधों के अधीन रहते हुए' शब्दों, ए” अंकों श द, अंक और अक्षरों अ र का लोप किया गया । संविधान 4. (चवालीसवां सं वधान (चवाल सवां संशोधन) अधिनियम, अ ध नयम, 1978 की धारा 30 द्वारा (ध-8-979 से) “जिनके अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण, य परमादेश, प्रतिषेध, परमादे अधिकार-पृच्छा श, तषेध, अ धकार-पृ छा और उत्प्रेषण उ के प्रकार ds के लेख ds भी हैं अथवा gSa उनमें vFkok से किसी ls को” से आरंभ ls होकर vkjaHk “न्याय gksdj की सारवान् dh निष्फलता lkjoku~ हुई fu"Qyrk है, किसी gS क्षति fdlh के प्रतितोष ds के लिए” ds शब्दों fy,” के साथ ds समाप्त lkFk lekIr होने वाले gksus भाग okys के स्थान ds पर प्रतिस्थापित । ij izfrLFkkfirA सकेगा कि ऐसी सरकार या प्राधिकारी का स्थान या ऐसे व्यक्ति का निवास-स्थान उन राज्यक्षेत्रों के भीतर नहीं है । 1 पक्षकार,
- (3) जहां कोई जिसके विरुदूध खंड (1) के अधीन किसी याचिका पर कार्यवाही या उससे संबंधित किसी मैं व्यादेश श के रूप में या रोक के रूप मैं या किसी अन्य रीति से कोई अंतरिम आदेश—
- (क) ऐसे पक्षकार को ऐसी याचिका की और ऐसे अंतरिम आदेश श के लिए अभिवाक् के समर्थन में सभी दस्तावेजों की प्रतिलिपियां; और
- (ख) ऐसे को सुनवाई का अवसर, पक्षकार दिए बिना किया गया है, ऐसे आदेश श को रदूद कराने के लिए उच्च न्यायालय को आवेदन करता है और ऐसे आवेदन की एक उस को जिसके में ऐसा आदेश श गया है या उसके काउं सेल को देता ता है वहां उच्च न्यायालय उसकी प्राप्ति की तारीख प्रतिलिपि पक्षकार पक्ष से या ऐसे आवेदन की इस प्रकार दिए जाने की तारीख से दो सप्ताह की अवधि किया काउंसेल के भीतर, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, या जहां उच्च न्यायालय उस अवधि के अंतिम प्रतिलिपि दिन बंद है वहां उसके ठीक बाद वाले दिन की समाप्ति से पहले जिस दिन उच्च न्यायालय खुला है, आवेदन को निपटाएगा और यदि आवेदन इस प्रकार नहीं निपटाया जाता है तो अंतरिम आदेश, श, उक्त अवधि की या उक्त ठीक बाद वाले दिन की समाप्ति पर रदद हो जाएगा शू(4) यथास्थिति,
- (4) इस अनुच्छेद द द्वारा उच्च न्यायालय को शक्ति से, अनुच्छेद द 32 के दूवारा प्रदत्त खंड (2) दूवारा उच्चतम न्यायालय को शक्ति का अल्पीकरण नहीं होगा । प्रदत्त
इसका अर्थ
ऊपर लिखे अनुच्छेद का सार। यह कानूनी सलाह नहीं है।
यह अनुच्छेद हर उच्च न्यायालय को निदेश, आदेश या रिट जारी करने की व्यापक शक्ति देता है। इनमें बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा और परमादेश परीक्षण आते हैं। उच्च न्यायालय इन्हें मूल अधिकारों के लिए भी और अन्य कानूनी अधिकारों के लिए भी दे सकता है, इसीलिए यह शक्ति अनुच्छेद 32 से व्यापक है। रिट अपने क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति या सरकार तक पहुंच सकती है। बिना सूचना दिया अंतरिम आदेश आवेदन पर रद्द किया जा सकता है।