भाग 5 · संघ
अनुच्छेद 123 संसद् के विश्रांतिकाल में अध्यादेश श करने की राष्ट्रपति की शक्ति
- (1) उस समय को छोड़कर जब संसद् के दोनों सदन सत्र मैं हैं, यदि किसी समय शक्तियों राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं जिनके कारण तुरन्त कार्रवाई करना उसके लिए आवश्यक हो गया है तो वह ऐसे अध्यादेश श कर सकेगा जो उसे उन में प्रतीत हों । । ऊध्याय 3-राष्ट्रपति की विधायी शक्तियां (2) इस अनुच्छेद द के अधीन प्रख्यापित अध्यादेश श का वही बल और प्रभाव होगा जो संसद् के अधिनियम का होता है, किन्तु प्रत्येक ऐसा अध्यादेश-- श— प्रख्यापित (क) संसद् के दोनों सदनों के रखा जाएगा और संसद् के पुनः समवेत होने से छह सप्ताह की समाप्ति पर या यदि उस अवधि की समाप्ति से पहले दोनों सदन उसके अननुमोदन का संकल्प पारित कर देते हैं तो, इनमें से द प्रख्यापित संकल्प के पारित होने पर प्रवर्तन में नहीं रहेगा; और परिस्थितियों अपेक्षित समक्ष दूसरे भारत का संविधान जा (ख) राष्ट्रपति दूवारा किसी भी समय वापस लिया जा सकेगा स्पष्टीकरण-जहां । संसद् के सदन, भिन्न-भिन्न तारीखों को पनः समवेत होने के लिए, आहूत किए जाते हैं वहां इस खंड के प्रयोजनों के लिए, छह सप्ताह की अवधि की पश्चातवर्ती गणना उन तारीखों में से तारीख से की जाएगी । यदि (3) और जहां तक इस अनुच्छेद द के अधीन अध्यादेश श कोई ऐसा उपबंध करता अधिनियमित सक्षम है जिसे करने के लिए संसद् इस संविधान के अधीन नहीं है तो और वहां तक वह अध्यादेश श शून्य होगा । के न न * * अध्याय 4–संघ की न्यायपालिका
इसका अर्थ
ऊपर लिखे अनुच्छेद का सार। यह कानूनी सलाह नहीं है।
यह अनुच्छेद संसद के सत्र में न होने पर राष्ट्रपति को कानून बनाने देता है। परिस्थिति तत्काल कार्रवाई मांगे, तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है। उसकी शक्ति संसद के अधिनियम जैसी होती है। उसे दोनों सदनों के सामने रखना होता है। संसद के पुनः बैठने के छह सप्ताह बाद वह लागू नहीं रहता। जो उपबंध संसद नहीं बना सकती, वह अध्यादेश में भी शून्य है।