भाग 5 · संघ
अनुच्छेद 139क कुछ मामलों का अंतरण– 2[(1) ऐसे मामले, विधि के समान
- या सारतः समान प्रश्न हैं, उच्चतम न्यायालय के और एक या अधिक उच्च यदि जिनमें न्यायालयों के अथवा दो या अधिक उच्च न्यायालयों के लंबित हैं और उच्चतम अंतर्वत्रित न्यायालय का स्वप्रेरणा से अथवा भारत के महान्यायवादी दूवारा या ऐसे किसी मामले के समक्ष किसी द्वारा किए गए आवेदन पर यह समाधान हो जाता है कि ऐसे प्रश्न व्यापक महत्व के सारवान ् प्रश्न हैं तो, उच्चतम न्यायालय उस उच्च न्यायालय या उन पक्षकार उच्च न्यायालयों के लंबित मामले या मामलों को अपने पास मंगा सकेगा और उन सभी मामलों को स्वंय निपटा सकेगा: समक्ष परन्तु उच्चतम न्यायालय इस प्रकार मंगाए गए मामले को उक्त विधि के प्रश्नों का अवधारण करने के पश्चात ् ऐसे प्रश्नों पर अपने निर्णय की सहित उस उच्च न्यायालय को, जिससे मामला मंगा लिया गया है, लौटा सकेगा और वह उच्च न्यायालय उसके प्राप्त होने पर उस मामले को ऐसे निर्णय के अनुरूप निपटाने के लिए आगे प्रतित्रिपि करेगा गा ।
- (2) यदि उच्चतम न्यायालय न्याय के उद्दे श्य के लिए ऐसा करना समीचीन समझता है तो वह किसी उच्च न्यायालय के लंबित किसी मामले, अपील कार्यवाही या अन्य का अंतरण किसी अन्य उच्च न्यायालय को कर सकेगा ।
इसका अर्थ
ऊपर लिखे अनुच्छेद का सार। यह कानूनी सलाह नहीं है।
यह अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय को मुकदमे एक जगह लाने देता है। विधि का कोई प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय और एक या अधिक उच्च न्यायालयों में लंबित हो, तो मुकदमे स्थानांतरित कर एक साथ सुने जा सकते हैं। न्यायालय अपनी पहल पर या आवेदन पर कार्य कर सकता है। न्याय के हित में वह एक उच्च न्यायालय से दूसरे को मुकदमा भी भेज सकता है।